अक्ल घास चर आई, अब क्या करे गाय


 
एक बहुत पुराना चुटकुला है। एक आदमी ने एक खाली कागज दिखाते हुए कहा कि इस चित्र का शीर्षक है- 'घास चरती हुई गाय।' दूसरे ने सवाल किया- 'लेकिन इसमें घास कहां है?' चित्रकार ने कहा- 'वह तो गाय चर गई।' देखने वाले ने कहा- 'लेकिन इसमें तो गाय भी नहीं है?' चित्रकार ने कहा- 'वह घास चरकर चली गई।' इसी गाय ने, जो थी ही नहीं, दादरी में बवाल करवा दिया।

जो नहीं है, उसके सहारे बवाल, हिंसा और हत्या करवा देने के लिए विशेष प्रतिभा चाहिए। जिन लोगों ने यह करवाया है, उन्हें ऐसे मुद्दों पर तूफान खड़ा करने का पुराना अनुभव है, जो मुद्दे हैं ही नहीं। गाय अगर कहीं होती, तो भी वह बेचारी क्या कहती? यहां यह सवाल ही नहीं है, क्योंकि गाय तो इस पूरे दृश्य में कहीं थी ही नहीं। वर्चुअल रियलिटी इसी को कहते हैं। गाय तो थी ही नहीं, फिर घास किसने चरी? घास उन लोगों की अक्ल चर गई, जो इन आभासी भड़काने वालों के उकसावे में आ गए। और तो और, ये भाई लोग आज भी गोहत्या करने वालों के खिलाफ सींग भिड़ाने पर तुले हुए हैं।

अक्ल का और घास का रिश्ता गाय और घास के रिश्ते से भी अटूट है। घास चरने वाली अक्ल वह होती है, जो नहीं देख पाती कि गाय तो कहीं है नहीं, सिर्फ वे लोग हैं, जो धार्मिक भावनाओं का दोहन करके अपना उल्लू सीधा करते हैं। घास चरने वाली अक्ल वह होती है, जिससे आप धूल के एक कण बराबर झूठ से कुछ भी करवा सकते हैं, लेकिन पहाड़ के बराबर सच्चाई भी जिसे नहीं दिखती।

इसकी वजह यह है कि घास चरने वाली अक्ल भी उस चित्र की गाय की तरह होती है, यानी वह वास्तव में नहीं होती। यानी अनुपस्थित अक्ल को अदृश्य गाय की अवास्तविक हत्या की असंभव अफवाह सच मालूम देती है और एक सचमुच के इंसान की सचमुच हत्या हो जाती है। फैज अहमद फैज का मशहूर शेर है- वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र न था, वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है।  अब इसमें गाय क्या करे और घास क्या करे?

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