दिमाग का आहार(Indians problem)
भारत में शाकाहार और मांसाहार की बहस हिंसक और सांप्रदायिक हो चली है, लेकिन यह बहस इन दिनों पूरी दुनिया में चल रही है। वहां यह बहस धार्मिक न होकर नैतिक या पर्यावरण से संबंधित है। पश्चिम में जो लोग शाकाहार के समर्थक हैं, वे भी अक्सर उग्र हो जाते हैं। जो लोग स्वास्थ्य के कारणों से शाकाहारी हो गए हैं, वे उग्र तो नहीं होते, लेकिन शाकाहार के प्रचार में उत्साह उनमें भी खूब दिखता है। पश्चिम में एक और श्रेणी शाकाहारियों की है, जिन्हें 'वेजन' कहते हैं। ये लोग पशुओं से मिलने वाला कोई भी आहार यानी दूध वगैरह भी नहीं लेते। शाकाहारियों की एक दलील यह है कि मनुष्य मूलत: शाकाहारी प्राणी है और मांसाहार उसकी प्रकृति के अनुकूल नहीं है। एक और संप्रदाय चल पड़ा है, जिसका कहना है कि मनुष्य की समस्याएं इसलिए हैं कि वह प्रकृति से दूर हो गया है। वे न सिर्फ मांसाहार का, बल्कि पकाकर खाने का भी विरोध करते हैं। इनका कहना है कि कच्चे कंद-मूल फल खाने से ही इंसान का उद्धार होगा। हम जानते हैं कि इंसान और अन्य जीवों में सबसे बड़ा फर्क यह है कि इंसान का दिमाग बहुत विकसित होता है। मनुष्य एक ऐसा जीव है...