गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है
विज्ञान बताता है कि इंसान मूल रूप से जानवर है और सभ्य होने की कोशिश करता है। इस कोशिश में शिक्षा और धर्म उसकी मदद करते हैं। ये भी सच है कि इंसान अगर अपने मूल स्वभाव के खिलाफ कुछ करे, तो उसका दम घुटने लगता है।
इसलिए जब भी स्कूली शिक्षा, विज्ञान या धर्म हमें सभ्य, शालीन और क्षमाशील होने को कहते हैं, तो हम घुटन महसूस करते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे पेंटर बनने का सपना रखने वाले किसी बच्चे को मां-बाप ने जबरन इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन दिलवा दिया हो और हर दिन उसे लगे- बस और नहीं हो पाएगा।
सभ्य होने की इस मजबूरी में बहुत से लोगों ने हार मान ली है। यह तय कर लिया है कि नहीं, यह ढकोसला अब और नहीं। इस शिष्टता में हमारा दम घुटता है। मगर जिन तौर-तरीकों को समाज और धर्म ने जरूरी बताया है, अगर उसके खिलाफ कुछ करेंगे, तो दुनिया हंसेगी, और अंदर के जानवर को और दबाया, तो उसके बुनियादी अधिकारों का हनन होगा।
फिर उन्होंने एक तरकीब निकाली। सोचा, क्यों न धर्म के नाम पर ही असभ्य हुआ जाए। जो दंगा-फसाद, मार-कुटाई, गाली-गलौच हम वैसे ही करना चाहते थे, क्यों न उसे धर्म के नाम पर किया जाए। इससे अंदर का जानवर भी शांत हो जाएगा और धर्म के नाम पर यह सब करने से ग्लानि भी नहीं होगी।
यह रणनीति इतनी कारगर साबित हुई कि हर धर्म में लोगों ने इसे अपनाना शुरू कर दिया। जो पहले यूं ही लड़-झगड़कर शर्मिंदा हुआ करते थे, जब से उन्होंने धर्म के नाम पर ऐसा करना शुरू किया, वे दूसरों को शर्मिंदा कर रहे हैं। हालत यह हो गई है कि ऐसे लोगों को रोकना तो दूर, जो इनका साथ नहीं दे रहे, वे भी आजकल इस शर्मिंदगी के कारण सो नहीं पा रहे कि दाल-रोटी के चक्कर में शायद वही अपने धर्म को ठीक से समझ नहीं पाए हैं।
बचपन में जवाब न आने पर कुछ नालायक बच्चे आंसरशीट में लिख दिया करते थे, गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है। सोचता हूं, कितने ईमानदार थे वे।
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