पहले कृषि प्रधान था, अब एजेंट प्रधान देश है भारत

पहले कृषि प्रधान था, अब एजेंट प्रधान देश है भारत
 
क्रांतिकारी जी की मानें तो इस देश में हर दूसरा आदमी मुकेश अंबानी का एजेंट है। यहां तक कि अंबानी साहब भी खुद को मुकेश अंबानी न मानकर अंबानी का एजेंट मानने लगे हैं। उन्होंने इतने लोगों को अंबानी का एजेंट बता दिया है कि अगर वे खुद को रिलायंस का कर्मचारी मानते हुए सैलरी मांगने लगे, तो भारत की सबसे बड़ी कंपनी दो दिन में दिवालिया हो जाए।

जो कांग्रेसी पहले हर चीज में संघ का हाथ ढूंढ़ते थे, यहां तक कि कांग्रेस के झंडे में भी जो हाथ है, वह भी उन्हें कभी-कभी संघ का लगता था, वही आज हर आदमी में संघ का एजेंट ढूंढ़ रहे हैं। हालत यह है कि अगर किसी कांग्रेसी की चप्पल भी खो जाए, तो आधे घंटे बाद वह चप्पल तो नहीं, लेकिन चार-पांच संघ के एजेंट खोजकर जरूर लौट आता है।

भाजपा वालों ने तो इतनों को पाकिस्तान का एजेंट बता दिया है कि उनकी संख्या एलआईसी एजेंटों से ज्यादा हो गई है। भाजपा नेता जो डिक्शनरी भी यूज करते हैं, उसमें 'सहमत' के विलोम शब्द में 'असहमत' की जगह पाकिस्तानी एजेंट लिखा हुआ है। भाजपा कार्यकर्ता की तो गर्लफ्रेंड भी उसे धोखा दे दे, तो वह बेवफा नहीं, पाकिस्तानी एजेंट कहलाती है। एक कार्यकर्ता ने तो पाकिस्तानी लड़की के प्रेम प्रस्ताव को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया कि कल को वह उसे धोखा दे देती, तो क्या कहकर वह उसे शर्मिंदा करता, क्योंकि पाकिस्तानी तो वह पहले से थी।

अंबानी के एजेंट, संघ के एजेंट, पाकिस्तानी एजेंट... कुल मिलाकर देश में इतने एजेंट हो गए हैं कि अगर सबको जोड़ दिया जाए, तो आबादी के हिसाब से ये दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन सकते हैं। आज अगर जेम्स बांड भी भारत आ जाएं, तो सीक्रेट सर्विस एजेंट मानने की बजाय लोग उन्हें संघ या मुकेश अंबानी का एजेंट घोषित करवा देंगे।
और जेम्स बांड तंग आकर जासूसी छोड़ किसी सरकारी स्कूल के बाहर गैस वाले गुब्बारे बेचने लगेंगे। इस पूरे एजेंटमयी माहौल पर निदा फाजली के शेर को तब्दील करूं तो वह ऐसा होता- हर आदमी में होते हैं दस-बीस एजेंट, जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।

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